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द्रोण पर्व
अध्याय ६७
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सञ्जय़ उवाच
अश्वांश्चास्यावधीत्तूर्णं सारथिं च महारथः |  ४२   क
विव्याध चैनं सप्तत्या नाराचानां महावलः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति