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उद्योग पर्व
अध्याय १०३
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गरुड उवाच
वृतश्चैष महानागः स्थापितः समय़श्च मे |  ५   क
अनेन च मय़ा देव भर्तव्यः प्रसवो महान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति