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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
युध्यतामेव तेषां तु भास्करेऽस्तमुपागते |  १   क
सन्ध्या समभवद्घोरा नापश्याम ततो रणम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति