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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
वरुणः पाशभृद्वापि सगदो वा धनेश्वरः |  १७   क
न तु भीष्मः सुसङ्क्रुद्धः शक्यो जेतुं महाहवे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति