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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्जुनो भीष्ममपास्य युद्धे; विद्ध्वास्य यन्तारमरिष्टधन्वा |  १८   क
तस्थौ विमुक्तो रथवृन्दमध्या; द्राहुं विदार्येव सहस्ररश्मिः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति