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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
सोमकांश्च जितान्दृष्ट्वा निरुत्साहान्महारथान् |  ४   क
चिन्तय़ित्वा चिरं ध्यात्वा अवहारमरोचय़त् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति