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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
कथं जय़ेम धर्मज्ञ कथं राज्यं लभेमहि |  ५८   क
प्रजानां सङ्क्षय़ो न स्यात्कथं तन्मे वदाभिभो ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति