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भीष्म पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
निर्जिते मय़ि युद्धे तु ध्रुवं जेष्यथ कौरवान् |  ६६   क
क्षिप्रं मय़ि प्रहरत यदीच्छथ रणे जय़म् |  ६६   ख
अनुजानामि वः पार्थाः प्रहरध्वं यथासुखम् ||  ६६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति