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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
एष भ्राता सखा चैव तव कृष्ण धनञ्जय़ः |  २४   क
रक्षितव्यो महावाहो सर्वास्वापत्स्विति प्रभो |  २४   ख
तव चैवं व्रुवाणस्य तथेत्येवाहमव्रुवम् ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति