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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
तमुत्तीर्णं रथानीकात्तमसो भास्करं यथा |  १   क
दिधारय़िषुराचार्यः शरवर्षैरवाकिरत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति