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द्रोण पर्व
अध्याय १२४
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सञ्जय़ उवाच
स्रष्टारं सर्वलोकानां परमात्मानमच्युतम् |  १४   क
ये प्रपन्ना हृषीकेशं न ते मुह्यन्ति कर्हिचित् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति