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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
यदा तु विशिखैस्तीक्ष्णैर्द्रोणचापविनिःसृतैः |  १२   क
वध्यन्ते समरे वीराः शतशोऽथ सहस्रशः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति