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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
यथा हि गोवृषो वर्षं प्रतिगृह्णाति लीलय़ा |  १४   क
तथा भीमो नरव्याघ्रः शरवर्षं समग्रहीत् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति