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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
स वध्यमानः समरे रथं द्रोणस्य मारिष |  १५   क
ईषाय़ां पाणिना गृह्य प्रचिक्षेप महावलः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति