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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ८
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वैशम्पाय़न उवाच
अहं तु पुत्रो भगवान्पिता राजा गुरुश्च मे |  ८   क
निदेशवर्ती च पितुः पुत्रो भवति धर्मतः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति