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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
स मृद्नन्क्षत्रिय़ानाजौ वातो वृक्षानिवोद्धतः |  १९   क
अगच्छद्दारय़न्सेनां सिन्धुवेगो नगानिव ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति