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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
सोऽपश्यदर्जुनं तत्र युध्यमानं नरर्षभम् |  २५   क
सैन्धवस्य वधार्थं हि पराक्रान्तं पराक्रमी ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति