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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
विशोकश्चाभवद्राजा श्रुत्वा तं निनदं महत् |  ३०   क
धनञ्जय़स्य च रणे जय़माशास्तवान्विभुः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति