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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
हृद्गतं मनसा प्राह ध्यात्वा धर्मभृतां वरः |  ३२   क
दत्ता भीम त्वय़ा संवित्कृतं गुरुवचस्तथा ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति