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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
निवातकवचा येन देवैरपि सुदुर्जय़ाः |  ३७   क
निर्जिता रथिनैकेन दिष्ट्या पार्थः स जीवति ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति