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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
पुत्रशोकाभिसन्तप्तश्चिकीर्षुः कर्म दुष्करम् |  ४२   क
जय़द्रथवधान्वेषी प्रतिज्ञां कृतवान्हि यः |  ४२   ख
कच्चित्स सैन्धवं सङ्ख्ये हनिष्यति धनञ्जय़ः ||  ४२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति