द्रोण पर्व  अध्याय १०३

सञ्जय़ उवाच

कच्चित्तीर्णप्रतिज्ञं हि वासुदेवेन रक्षितम् |  ४३   क
अनस्तमित आदित्ये समेष्याम्यहमर्जुनम् ||  ४३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति