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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा चान्यान्वहून्योधान्पातितान्धरणीतले |  ४७   क
कच्चिद्दुर्योधनो मन्दः पश्चात्तापं करिष्यति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति