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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रस्थाप्यतां पाण्डव धार्तराष्ट्रः; सुय़ोधनः पापकृतां वरिष्ठः |  ३३   क
स सानुवन्धः ससुहृद्गणश्च; सौभस्य सौभाधिपतेश्च मार्गम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति