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आदि पर्व
अध्याय १०४
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वैशम्पाय़न उवाच
निगूढनिश्चय़ं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः |  ५   क
तमुग्रं संशितात्मानं सर्वय़त्नैरतोषय़त् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति