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आदि पर्व
अध्याय १०४
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वैशम्पाय़न उवाच
सा ददर्श तमाय़ान्तं भास्करं लोकभावनम् |  ९   क
विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति