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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
न नित्यं परिभूय़ारीन्सुखं स्वपिति वासव |  ११   क
जागर्त्येव च दुष्टात्मा सङ्करेऽग्निरिवोत्थितः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति