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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
अथास्य प्रहरेत्काले किञ्चिद्विचलिते पदे |  १४   क
दण्डं च दूषय़ेदस्य पुरुषैराप्तकारिभिः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति