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द्रोण पर्व
अध्याय १६०
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सञ्जय़ उवाच
तं तथाभिप्रशंसन्तमर्जुनं कुपितस्तदा |  २१   क
द्रोणं तव सुतो राजन्पुनरेवेदमव्रवीत् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति