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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
तथा विविधशीलानामपि सम्भव उच्यते |  ३२   क
यतेत योगमास्थाय़ मित्रामित्रानवारय़न् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति