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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
मृदुमप्यवमन्यन्ते तीक्ष्णादुद्विजते जनः |  ३३   क
मातीक्ष्णो मामृदुर्भूस्त्वं तीक्ष्णो भव मृदुर्भव ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति