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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
अहितेषु कथं व्रह्मन्वर्तय़ेय़मतन्द्रितः |  ४   क
असमुच्छिद्य चैवेनान्निय़च्छेय़मुपाय़तः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति