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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
पुराणि चैषामनुसृत्य भूमिपाः; पुरेषु भोगान्निखिलानिहाजय़न् |  ४१   क
पुरेषु नीतिं विहितां यथाविधि; प्रय़ोजय़न्तो वलवृत्रसूदन ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति