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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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इन्द्र उवाच
कानि लिङ्गानि दुष्टस्य भवन्ति द्विजसत्तम |  ४४   क
कथं दुष्टं विजानीय़ादेतत्पृष्टो व्रवीहि मे ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति