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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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वृहस्पतिरु उवाच
परोक्षमगुणानाह सद्गुणानभ्यसूय़ति |  ४५   क
परैर्वा कीर्त्यमानेषु तूष्णीमास्ते पराङ्मुखः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति