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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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वृहस्पतिरु उवाच
करोत्यभीक्ष्णं संसृष्टमसंसृष्टश्च भाषते |  ४७   क
अदृष्टितो विकुरुते दृष्ट्वा वा नाभिभाषते ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति