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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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वृहस्पतिरु उवाच
आर्तिरार्ते प्रिय़े प्रीतिरेतावन्मित्रलक्षणम् |  ४९   क
विपरीतं तु वोद्धव्यमरिलक्षणमेव तत् ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति