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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
प्रिय़मेव वदेन्नित्यं नाप्रिय़ं किञ्चिदाचरेत् |  ९   क
विरमेच्छुष्कवैरेभ्यः कण्ठाय़ासं च वर्जय़ेत् ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति