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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
चण्डालोऽहं ततो राजन्भुक्त्वा तदभवं मृतः |  १०   क
व्रह्मस्वहारी च नृपः सोऽप्रतिष्ठां गतिं यय़ौ ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति