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शान्ति पर्व
अध्याय १७३
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युधिष्ठिर उवाच
वान्धवाः कर्म वित्तं वा प्रज्ञा वेह पितामह |  १   क
नरस्य का प्रतिष्ठा स्यादेतत्पृष्टो वदस्व मे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति