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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
सोमं तु रजसा ध्वस्तं विक्रीय़ाद्वुद्धिपूर्वकम् |  १४   क
श्रोत्रिय़ो वार्धुषी भूत्वा चिररात्राय़ नश्यति |  १४   ख
नरकं त्रिंशतं प्राप्य श्वविष्ठामुपजीवति ||  १४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति