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शान्ति पर्व
अध्याय २१५
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प्रह्राद उवाच
स्वभावाल्लभते प्रज्ञां शान्तिमेति स्वभावतः |  ३५   क
स्वभावादेव तत्सर्वं यत्किञ्चिदनुपश्यसि ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति