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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
अहं वै विपुले जातः कुले धनसमन्विते |  १७   क
अन्यस्मिञ्जन्मनि विभो ज्ञानविज्ञानपारगः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति