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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
अभवं तत्र जानानो ह्येतान्दोषान्मदात्तदा |  १८   क
संरव्ध एव भूतानां पृष्ठमांसान्यभक्षय़म् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति