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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
स्वाध्याय़ैस्तु महत्पापं तरन्ति गृहमेधिनः |  २१   क
दानैः पृथग्विधैश्चापि यथा प्राहुर्मनीषिणः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति