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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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चण्डाल उवाच
जातिस्मरत्वं तु मम केनचित्पूर्वकर्मणा |  २४   क
शुभेन येन मोक्षं वै प्राप्तुमिच्छाम्यहं नृप ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति