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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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राजन्य उवाच
दत्त्वा शरीरं क्रव्याद्भ्यो रणाग्नौ द्विजहेतुकम् |  २७   क
हुत्वा प्राणान्प्रमोक्षस्ते नान्यथा मोक्षमर्हसि ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति