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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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राजन्य उवाच
वृद्धरूपोऽसि चण्डाल वालवच्च विचेष्टसे |  ३   क
श्वखराणां रजःसेवी कस्मादुद्विजसे गवाम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति