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अनुशासन पर्व
अध्याय १०४
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राजन्य उवाच
साधुभिर्गर्हितं कर्म चण्डालस्य विधीय़ते |  ४   क
कस्माद्गोरजसा ध्वस्तमपां कुण्डे निषिञ्चसि ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति