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वन पर्व
अध्याय १०४
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लोमश उवाच
तं प्रीतिमान्हरः प्राह सभार्यं नृपसत्तमम् |  १३   क
यस्मिन्वृतो मुहूर्तेऽहं त्वय़ेह नृपते वरम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति