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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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वासुदेव उवाच
शक्रस्य तु वचः श्रुत्वा नाहं प्रीतमनाभवम् |  ९३   क
अव्रुवं च तदा कृष्ण देवराजमिदं वचः ||  ९३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति